Saraikela (संजीव मेहता): टाटा ट्रस्ट ने देशभर में 40–50 गैर-लाभकारी अस्पताल खोलने का किया एलान, परोपकार पर खर्च किए 1,556 करोड़ रुपए

Sanjeev mehta
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Saraikela (संजीव मेहता):
टाटा ट्रस्ट ने देशभर में 40–50 गैर-लाभकारी अस्पताल खोलने का किया एलान, परोपकार पर खर्च किए 1,556 करोड़ रुप

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Saraikela :

टाटा ट्रस्ट ने वित्त वर्ष 2025-26 में परोपकारी कार्यों पर ₹1,556.31 करोड़ खर्च किए हैं. ट्रस्ट की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में 40 से 50 गैर-लाभकारी सामान्य अस्पतालों का नेटवर्क विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है. इस पहल का उद्देश्य जरूरतमंद लोगों को सुलभ और किफायती स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है.

* ग्रामीण विकास पर सबसे ज्यादा खर्च-

रिपोर्ट के मुताबिक, संस्थागत अनुदान और प्रत्यक्ष परियोजनाओं पर ₹1,353.32 करोड़, जबकि व्यक्तिगत अनुदान के रूप में ₹202.99 करोड़ खर्च किए गए. ग्रामीण विकास के लिए सबसे अधिक ₹457.62 करोड़ आवंटित हुए. इसके अलावा शिक्षा पर ₹270.26 करोड़, कैंसर उपचार पर ₹178.46 करोड़ और संस्थानों के विकास पर ₹169.31 करोड़ खर्च किए गए.

* स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं पर फोकस-

ट्रस्ट ने स्वास्थ्य सेवाओं पर ₹105.97 करोड़, जल एवं स्वच्छता पर ₹59.04 करोड़ और पोषण कार्यक्रमों पर ₹57.64 करोड़ खर्च किए. व्यक्तिगत अनुदान के तहत चिकित्सा सहायता के लिए ₹143.30 करोड़ और शिक्षा के लिए ₹59.38 करोड़ दिए गए.

* कैंसर उपचार कार्यक्रम से एक लाख से अधिक मरीज लाभान्वित-

वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 में कैंसर कार्यक्रम के तहत 1,06,626 बाह्य रोगियों को परामर्श दिया गया. इस दौरान कीमोथेरेपी के 24,874 चक्र पूरे किए गए और 29,638 मरीजों को रेडिएशन थेरेपी उपलब्ध कराई गई. वहीं, 13,031 नए मरीजों का पंजीकरण हुआ.

* 2026–2031 तक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की योजना-

टाटा ट्रस्ट की आगामी स्वास्थ्य रणनीति में लगभग 25 लाख लोगों तक पहुंचने और 20,000 से अधिक अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों को बेहतर प्रशिक्षण देने का लक्ष्य बताया गया है. इसके साथ ही विभिन्न राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और प्राथमिकता वाले जिलों में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों की क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा.

* संस्थानों की गुणवत्ता और जवाबदेही पर जोर-

टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा ने कहा कि परोपकार की सफलता केवल खर्च की गई राशि या लाभार्थियों की संख्या से नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में आए वास्तविक बदलाव से आंकी जानी चाहिए। उन्होंने संस्थानों की कार्यक्षमता, दक्षता और जवाबदेही को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया.

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