Saraikela (संजीव मेहता): आदित्यपुर वार्ड-1 में सदियों पुराने तालाब को भरने का मामला गरमाया, 94 लाख के टेंडर से लेकर वनभूमि पर खुदाई तक उठे सवाल

Sanjeev mehta
7 Min Read

Saraikela (संजीव मेहता):

Advertisements
Advertisements
Advertisements

आदित्यपुर वार्ड-1 में सदियों पुराने तालाब को भरने का मामला गरमाया, 94 लाख के टेंडर से लेकर वनभूमि पर खुदाई तक उठे सवा

* खातियान में 38 डिसमिल तालाब का जिक्र, फिर तालाब कहां गया? क्या तालाब बचाने के बजाय दूसरी जगह खुदाई कर मामले को दिया गया नया मोड़?

Saraikela :
आदित्यपुर नगर निगम के वार्ड संख्या-1 में सदियों पुराने तालाब को भरने का मामला एक बार फिर गरमा गया है. तालाब के अस्तित्व, जमीन की प्रकृति, नगर निगम की कथित विकास योजना और वनभूमि पर तालाब की खुदाई को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. सवाल सिर्फ एक तालाब के अस्तित्व का नहीं, बल्कि सरकारी जमीन के रिकॉर्ड, प्रशासनिक सत्यापन और सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण का भी है.
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मूल खतियान में प्लॉट संख्या-138 की जमीन की किस्म ‘बांध’ दर्ज होने की बात कही जा रही है. यदि राजस्व अभिलेखों में जमीन की प्रकृति वास्तव में बांध या जलाशय के रूप में दर्ज है, तो उसे भरने और उसका स्वरूप बदलने की अनुमति किस आधार पर दी गई? या फिर सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज जमीन की प्रकृति को नजरअंदाज कर दिया गया?

* 94 लाख का टेंडर, फिर दूसरी जगह तालाब की खुदाई क्यों ?

मामले को और गंभीर बनाती है तालाब के जीर्णोद्धार से जुड़ी जानकारी. स्थानीय सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि इसी तालाब के जीर्णोद्धार के लिए नगर निगम की ओर से करीब 94 लाख रुपये का टेंडर किया गया था. वहीं, यह भी जानकारी सामने आई है कि मूल तालाब को भरने की योजना के बीच दूसरी जगह तालाब की खुदाई कराई गई.
यदि ऐसा हुआ है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि मूल तालाब के संरक्षण के बजाय दूसरी जगह खुदाई करने का निर्णय किस आधार पर लिया गया ? सूत्रों के मुताबिक, दूसरी जगह तालाब की खुदाई वनभूमि पर किए जाने की बात भी सामने आई है. यदि यह दावा सही है, तो वनभूमि पर खुदाई के लिए वन विभाग की अनुमति ली गई थी या नहीं, इसकी जांच जरूरी है. क्या वन विभाग को इसकी जानकारी थी? यदि जानकारी थी, तो क्या आवश्यक अनुमति दी गई थी? और यदि अनुमति नहीं थी, तो जिम्मेदार कौन है ?
94 लाख रुपये के टेंडर और दूसरी जगह तालाब की खुदाई के बीच वास्तविक वित्तीय एवं प्रशासनिक संबंध क्या है? इसका जवाब टेंडर दस्तावेज, प्राक्कलन, मापी पुस्तिका (एमबी), भुगतान विवरण और स्थल निरीक्षण रिपोर्ट से ही सामने आ सकता है.

* सीओ के सत्यापन पर भी उठेंगे सवाल ?

जमीन की प्रकृति, प्लॉट की पहचान और सीमांकन की प्रक्रिया को लेकर अंचल कार्यालय की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है. यदि जमीन के राजस्व रिकॉर्ड में बांध या तालाब का उल्लेख है, तो सीमांकन के समय इन तथ्यों का सत्यापन कैसे किया गया ? क्या खतियान, नक्शा और मौके की स्थिति का मिलान हुआ था ? क्या संबंधित अधिकारियों ने सभी दस्तावेजों की जांच के बाद रिपोर्ट तैयार की ? हालांकि, अंचल अधिकारी या किसी अन्य अधिकारी की भूमिका पर निष्कर्ष निकालने से पहले सत्यापन रिपोर्ट और संबंधित अभिलेखों की जांच जरूरी है. लेकिन यदि रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में अंतर पाया जाता है, तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए.

* 903 मतदाताओं का क्षेत्र, सीमांकन में महज दर्जनभर लोग क्यों ?

इस पूरे मामले में एक और अहम सवाल फ्लाई ऐश भरने और सीमांकन की प्रक्रिया को लेकर उठ रहा है. स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार, संबंधित क्षेत्र में करीब 903 मतदाता पंजीकृत हैं, जबकि सीमांकन के दौरान महज दर्जनभर लोगों के मौजूद रहने की बात कही जा रही है. यदि ग्रामीण पिछले तीन वर्षों से तालाब बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और लगातार विरोध जता रहे हैं, तो फिर सीमांकन के समय इतनी कम भागीदारी क्यों रही ? क्या प्रभावित ग्रामीणों को पर्याप्त सूचना दी गई थी ? क्या विरोध कर रहे लोगों को अपनी आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिला ? और क्या मौके पर मौजूद कुछ लोगों की सहमति को पूरे क्षेत्र की सहमति माना जा सकता है ? यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि सीमांकन की वैधानिक प्रक्रिया क्या थी, नोटिस किसे दिया गया, उपस्थिति पंजिका में किन लोगों के हस्ताक्षर हैं और ग्रामीणों की आपत्तियों को रिकॉर्ड में दर्ज किया गया या नहीं. सिर्फ सीमांकन के दौरान कम लोगों की मौजूदगी अपने आप में प्रक्रिया को अवैध साबित नहीं करती, लेकिन जब जमीन और तालाब के अस्तित्व को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा हो, तब पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता की जांच बेहद जरूरी हो जाती है.

* अब उपायुक्त से होगी पूरे मामले की जांच की मांग-

तालाब के वास्तविक रकबे और प्लॉट की पहचान से लेकर टेंडर की राशि, दूसरी जगह खुदाई, वनभूमि की स्थिति और सीमांकन की प्रक्रिया तक कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब आधिकारिक दस्तावेजों से मिलना चाहिए. इस विषय पर विस्तृत जानकारी और संबंधित अभिलेखों की जांच के लिए उपायुक्त का रुख किए जाने की तैयारी है. प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि मूल तालाब की वर्तमान स्थिति क्या है, उसे भरने की अनुमति किसने दी, जीर्णोद्धार के लिए स्वीकृत राशि का उपयोग कहां हुआ और दूसरी जगह तालाब की खुदाई किस जमीन पर तथा किस अनुमति से की गई. आखिर 38 डिसमिल के पुराने तालाब का रिकॉर्ड क्या कहता है ? 94 लाख रुपये के टेंडर का वास्तविक हिसाब क्या है ? वनभूमि पर खुदाई की अनुमति किसने दी ? और तीन वर्षों से तालाब बचाने की मांग कर रहे ग्रामीणों की आपत्तियों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई ? इन सवालों का जवाब केवल जांच, राजस्व अभिलेखों और सरकारी दस्तावेजों से ही सामने आ सकता है. अब देखना यह है कि प्रशासन इन सवालों पर क्या रुख अपनाता है और तालाब की जमीन को लेकर वास्तविक स्थिति कब स्पष्ट होती है.

Share This Article